प्रस्तावना: तकनीक के इस दौर में जहाँ हम डिजिटल इंडिया की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, वहीं साइबर अपराधी भी मासूम नागरिकों को ठगने के लिए नए और खतरनाक तरीके अपना रहे हैं। इंदौर में हाल के दिनों में ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) के मामलों में चौंकाने वाली बढ़ोतरी देखी गई है। यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक हमला है जिसमें अपराधी घर बैठे व्यक्ति को मोबाइल स्क्रीन के जरिए कैद कर लेते हैं और उनसे लाखों रुपये ऐंठ लेते हैं। इंदौर साइबर सेल ने इस गंभीर खतरे को देखते हुए अब शहरव्यापी ‘जागरूकता मुहिम’ शुरू की है।
क्या है डिजिटल अरेस्ट और यह कैसे काम करता है? ‘डिजिटल अरेस्ट’ वास्तव में कानून में कोई शब्द नहीं है, बल्कि यह साइबर ठगों द्वारा रची गई एक साजिश है। ठग खुद को सीबीआई (CBI), ईडी (ED), क्राइम ब्रांच या पुलिस अधिकारी बताकर पीड़ित को वीडियो कॉल करते हैं। वे अक्सर पुलिस की वर्दी पहने होते हैं और उनके पीछे का बैकग्राउंड बिल्कुल असली पुलिस स्टेशन जैसा दिखता है। अपराधी पीड़ित को डराते हैं कि उनके नाम से कोई अवैध पार्सल पकड़ा गया है जिसमें ड्रग्स, हथियार या फर्जी पासपोर्ट हैं। इसके बाद वे कहते हैं कि आपको ‘डिजिटल अरेस्ट’ किया गया है और जब तक जांच पूरी नहीं होती, आप कैमरा बंद नहीं कर सकते और न ही किसी से बात कर सकते हैं।
इंदौर में हालिया मामले और प्रभाव: पिछले एक महीने में इंदौर के पॉश इलाकों जैसे विजय नगर, साकेत नगर और तिलक नगर से ठगी के आधा दर्जन से अधिक मामले सामने आए हैं। हाल ही में एक सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी से ठगों ने इसी तरीके से 15 लाख रुपये ऐंठ लिए। उन्हें लगातार 24 घंटे तक वीडियो कॉल पर रखा गया और जेल जाने का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर करवा लिए गए। ठगों का मुख्य निशाना बुजुर्ग, महिलाएं और वे लोग होते हैं जो कानून के नाम से घबरा जाते हैं।
साइबर सेल की विशेष मुहिम: इंदौर पुलिस कमिश्नर और साइबर सेल की टीम ने इस खतरे से निपटने के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है। शहर के प्रमुख चौराहों, मॉल और बाजारों में बड़े होर्डिंग्स लगाए गए हैं जिनमें साफ लिखा है— “कोई भी पुलिस अधिकारी वीडियो कॉल पर आपको गिरफ्तार नहीं करता।” पुलिस अब सोशल मीडिया, रेडियो और समाचार पत्रों के माध्यम से नागरिकों को शिक्षित कर रही है। साथ ही, बैंकों को भी निर्देश दिए गए हैं कि यदि कोई बुजुर्ग अचानक बड़ी राशि ट्रांसफर करने आए, तो उनसे पूछताछ की जाए।
कैसे पहचानें ठगी और क्या करें बचाव? साइबर विशेषज्ञों ने कुछ महत्वपूर्ण संकेत बताए हैं जिनसे इन ठगों को पहचाना जा सकता है:
- दबाव बनाना: ठग आपको सोचने का समय नहीं देते और कहते हैं कि “अभी के अभी” कार्रवाई होगी।
- गोपनीयता की शर्त: वे आपसे कहेंगे कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, इसलिए किसी को न बताएं।
- वीडियो कॉल पर जांच: भारतीय कानून में वीडियो कॉल पर किसी का बयान दर्ज करने या गिरफ्तार करने का कोई प्रावधान नहीं है।
- हेल्पलाइन 1930: यदि आपको ऐसा कोई भी कॉल आए, तो तुरंत घबराने के बजाय फोन काट दें और राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें या ‘cybercrime.gov.in’ पर शिकायत दर्ज करें।
कानूनी स्थिति और पुलिस की कार्रवाई: इंदौर साइबर सेल उन बैंक खातों और मोबाइल नंबरों को ट्रैक कर रही है जिनका उपयोग इन ठगों द्वारा किया गया है। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि इन ठग गिरोहों के तार कंबोडिया, वियतनाम और देश के भीतर झारखंड व जामताड़ा से जुड़े हैं। पुलिस ने अब तक कई संदिग्ध बैंक खातों को फ्रीज करवाया है और जनता से अपील की है कि वे अपनी निजी जानकारी जैसे आधार नंबर, बैंक ओटीपी या घर का पता अनजान कॉल करने वालों को न दें।
निष्कर्ष: ‘डिजिटल अरेस्ट’ केवल एक आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रहार करता है। इंदौर पुलिस की यह मुहिम तब तक सफल नहीं होगी जब तक नागरिक स्वयं जागरूक नहीं होंगे। याद रखें, कानून हमेशा प्रक्रिया का पालन करता है, वह डर का व्यापार नहीं करता। आपकी सतर्कता ही साइबर अपराधियों के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है।






