इंदौर। मध्य प्रदेश के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में से एक ‘इंदौर मेट्रो’ एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार वजह कोई नई उपलब्धि नहीं, बल्कि इसके निर्माण और टेंडर प्रक्रिया में सामने आई गंभीर गड़बड़ियां हैं। इंदौर मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के कामकाज में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए जांच को इंदौर से ‘बाहर’ स्थानांतरित (Transfer) कर दिया है। अब इस पूरे मामले की कमान भोपाल की विशेष तकनीकी और सतर्कता (Vigilance) टीमें संभालेंगी।
जांच बाहर भेजने की नौबत क्यों आई?
पिछले कुछ महीनों से इंदौर मेट्रो के सुपर कॉरिडोर से रेडिसन चौराहे तक के निर्माण कार्य में घटिया निर्माण सामग्री के उपयोग और टेंडर की शर्तों में गुपचुप बदलाव की शिकायतें मिल रही थीं।
- स्थानीय दबाव का अंदेशा: सूत्रों के अनुसार, जांच दल के कुछ सदस्यों पर स्थानीय रसूखदार ठेकेदारों और अधिकारियों द्वारा दबाव डालने की खबरें सामने आई थीं।
- साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका: चूंकि मामला करोड़ों रुपये के ट्रांजेक्शन से जुड़ा है, इसलिए शासन को डर था कि यदि जांच इंदौर में ही रही, तो महत्वपूर्ण दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है।
किन बिंदुओं पर होगी ‘सर्जिकल’ जांच?
इंदौर मेट्रो प्रोजेक्ट के अंतर्गत अब निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बाहरी टीमें अपनी रिपोर्ट तैयार करेंगी:
- टेंडर प्रक्रिया में धांधली: क्या कुछ चुनिंदा कंपनियों को लाभ पहुँचाने के लिए टेंडर की शर्तों को अंतिम समय में बदला गया?
- सब-कॉन्ट्रैक्टिंग का जाल: मुख्य ठेकेदार कंपनियों ने किन नियमों के तहत छोटे व अनुभवहीन स्थानीय ठेकेदारों को काम दिया?
- निर्माण की गुणवत्ता: पिलर्स और गर्डर्स के निर्माण में उपयोग किए गए सीमेंट और लोहे की गुणवत्ता की जांच अब लैब में दोबारा होगी।
- बजट का विचलन: स्वीकृत बजट से अधिक खर्च और बिना अनुमति के किए गए अतिरिक्त निर्माण कार्यों का ऑडिट किया जाएगा।
मार्च 2026 का लक्ष्य और जांच का असर
इंदौर में मार्च 2026 तक मेट्रो के कमर्शियल ऑपरेशन शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है।
- काम पर असर: प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जांच के कारण निर्माण कार्य को रोका नहीं जाएगा, लेकिन जो हिस्से संदिग्ध पाए जाएंगे, वहां काम की गति धीमी हो सकती है।
- अधिकारियों पर गाज: इस जांच के दायरे में मेट्रो कॉर्पोरेशन के कई वरिष्ठ अधिकारी और कंसल्टेंट्स आ सकते हैं। भोपाल से आई विशेष टीम ने पहले ही इंदौर दफ्तर से पिछले तीन सालों के फाइल रिकॉर्ड और ई-मेल लॉग जब्त कर लिए हैं।
राजनीतिक गलियारों में गरमाया मामला
जांच को बाहर शिफ्ट किए जाने पर राजनीति भी शुरू हो गई है। विपक्ष का कहना है कि यह केवल एक ‘आईवॉश’ (दिखावा) है ताकि बड़े मगरमच्छों को बचाया जा सके। वहीं, सत्ता पक्ष का दावा है कि मुख्यमंत्री ने जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है और वे चाहते हैं कि जांच बिना किसी स्थानीय प्रभाव के पूरी तरह निष्पक्ष हो।
क्या होगा अगला कदम?
बाहरी टीम को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर मुख्य सचिव को सौंपनी है। यदि रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि होती है, तो मामला सीधे आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) को सौंपा जा सकता है। इससे ठेकेदार कंपनियों की बैंक गारंटी जब्त होने और उन्हें ‘ब्लैकलिस्ट’ करने की नौबत भी आ सकती है।
निष्कर्ष
इंदौर मेट्रो शहर की जनता का सपना है, जिसे हजारों करोड़ रुपये के सार्वजनिक धन से सींचा जा रहा है। ऐसे में जांच को बाहर शिफ्ट करना यह दर्शाता है कि गड़बड़ियाँ गंभीर स्तर की हैं। अब देखना यह होगा कि भोपाल की टीमें इस जटिल ‘फाइलों के मायाजाल’ से सच बाहर ला पाती हैं या यह भी केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया बनकर रह जाएगी।







