प्रस्तावना: इंदौर का भागीरथपुरा क्षेत्र इस समय एक ऐसी मानवीय त्रासदी से गुजर रहा है, जिसने पूरे मध्य प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। जिसे ‘स्वच्छ शहर’ का गौरव प्राप्त है, उसी शहर के एक घनी आबादी वाले इलाके में दूषित पानी पीने से अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है। यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।
त्रासदी की शुरुआत और विस्तार: इस संकट की शुरुआत लगभग एक सप्ताह पहले हुई थी, जब भागीरथपुरा के कुछ घरों में लोगों ने उल्टी, दस्त और पेट दर्द की शिकायत की। शुरुआत में इसे सामान्य मौसमी बीमारी माना गया, लेकिन जब एक ही दिन में दर्जनों मरीज अस्पताल पहुंचने लगे, तब स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ। जांच में पाया गया कि नगर निगम द्वारा आपूर्ति की जाने वाली पेयजल पाइपलाइन में सीवेज (गंदे पानी) का रिसाव हो रहा था। पुरानी और जर्जर हो चुकी पाइपलाइनें कई जगहों से फूट गई थीं, जिसके कारण पीने के साफ पानी में मल-मूत्र और गंदगी मिल गई।
मौतों का सिलसिला और स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट: पिछले 48 घंटों में मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़कर 15 तक पहुंच गया है। मृतकों में सबसे अधिक संख्या छोटे बच्चों और बुजुर्गों की है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम थी। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी ‘मेडिकल ऑडिट रिपोर्ट’ में पुष्टि की गई है कि ये मौतें ‘विब्रियो कोलेरी’ (हैजा) और ‘ई-कोलाई’ जैसे खतरनाक बैक्टीरिया के संक्रमण से हुई हैं। वर्तमान में इंदौर के एमटीएच (MTH) और चाचा नेहरू अस्पताल के वार्ड इन मरीजों से भरे हुए हैं। डॉक्टरों का कहना है कि संक्रमण इतना तीव्र था कि कई मरीजों को अस्पताल लाने से पहले ही उनके शरीर में पानी की भारी कमी (डिहाइड्रेशन) हो गई और अंगों ने काम करना बंद कर दिया।
प्रशासनिक लापरवाही और जनता का आक्रोश: भागीरथपुरा के निवासियों का आरोप है कि उन्होंने महीनों पहले पानी के गंदे और बदबूदार होने की शिकायत नगर निगम के पीएचई (PHE) विभाग से की थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि अधिकारी आए, मुआयना किया, लेकिन ठोस कार्रवाई के बजाय केवल खानापूर्ति की गई। इस लापरवाही ने आज 15 परिवारों के चिराग बुझा दिए हैं। घटना के बाद क्षेत्र में भारी आक्रोश है। लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया और दोषियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा है।
सरकार और नगर निगम का ‘एक्शन’: मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने तत्काल जांच के आदेश दिए हैं। इंदौर नगर निगम के कमिश्नर ने इस मामले में प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए तीन इंजीनियरों और दो लाइनमैनों को सस्पेंड कर दिया है। प्रभावित इलाके में अब घर-घर जाकर सर्वे किया जा रहा है। नगर निगम ने पुरानी पाइपलाइन को पूरी तरह बंद कर दिया है और अब पूरे क्षेत्र में पानी के टैंकरों के माध्यम से पेयजल की आपूर्ति की जा रही है। जगह-जगह ‘क्लोरीन’ की गोलियां और ‘ओआरएस’ (ORS) के पैकेट बांटे जा रहे हैं ताकि संक्रमण को और फैलने से रोका जा सके।
निष्कर्ष: भागीरथपुरा की यह जल त्रासदी एक चेतावनी है। स्मार्ट सिटी और स्वच्छता रैंकिंग में नंबर वन आने वाले इंदौर के लिए यह एक काला अध्याय है। यह घटना बताती है कि चकाचौंध वाली सड़कों के नीचे बिछा हुआ बुनियादी ढांचा कितना खोखला हो चुका है। जब तक प्रशासन पुरानी पड़ चुकी जल निकासी और आपूर्ति व्यवस्था को आधुनिक नहीं बनाएगा, तब तक बेगुनाह लोगों की जान जोखिम में बनी रहेगी। आज भागीरथपुरा मातम में डूबा है, और यह मातम सिस्टम की विफलता की कहानी कह रहा है।






