इंदौर: इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से हुई मौतों और सैकड़ों लोगों के बीमार होने की घटना ने पूरे मध्य प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर राज्य सरकार ने अब इस मामले की तह तक जाने और प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के लिए एक ‘हाई-पावर कमेटी’ (उच्च-स्तरीय जांच समिति) का गठन किया है। यह समिति न केवल तकनीकी खामियों की जांच करेगी, बल्कि उन अधिकारियों की पहचान भी करेगी जिनकी लापरवाही ने स्वच्छता के शहर में इस मानवीय त्रासदी को जन्म दिया।
समिति की संरचना और नेतृत्व
इस विशेष जांच दल का नेतृत्व मध्य प्रदेश शासन के अपर मुख्य सचिव (ACS) संजय कुमार शुक्ला कर रहे हैं। समिति में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के प्रमुख इंजीनियर, नगरीय प्रशासन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और जल विज्ञान (Hydrology) के विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं। समिति को स्वायत्तता दी गई है कि वह किसी भी विभाग के दस्तावेज जब्त कर सके और संबंधित अधिकारियों से पूछताछ कर सके।
जांच के मुख्य बिंदु
हाई-पावर कमेटी मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर अपनी जांच केंद्रित करेगी:
● पाइपलाइन का तकनीकी फॉल्ट: समिति यह पता लगाएगी कि पीने के पानी की लाइन और सीवेज लाइन के बीच का ‘क्रॉस-कनेक्शन’ कब और कैसे हुआ। क्या यह निर्माण के दौरान हुई तकनीकी गलती थी या समय के साथ पाइपों के गलने (corrosion) के कारण हुआ?
● टेंडर और गुणवत्ता की जांच: भागीरथपुरा क्षेत्र में हाल के वर्षों में हुए पाइपलाइन बिछाने के कार्यों के टेंडर दस्तावेजों की समीक्षा की जाएगी। यह देखा जाएगा कि क्या घटिया सामग्री का उपयोग किया गया था।
● शिकायतों पर अनदेखी: स्थानीय निवासियों का दावा है कि उन्होंने हफ्तों पहले गंदे पानी की शिकायत की थी। समिति नगर निगम के ‘शिकायत सेल’ के रिकॉर्ड की जांच करेगी कि शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
● निगरानी प्रणाली की विफलता: इंदौर नगर निगम (IMC) के पास पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच के लिए एक निर्धारित प्रोटोकॉल है। समिति देखेगी कि क्या नियमित रूप से क्लोरीनीकरण और वॉटर सैंपलिंग की जा रही थी।
● मृत्यु दर और मेडिकल रिस्पॉन्स: समिति स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर यह भी देखेगी कि क्या शुरुआती मरीजों को सही इलाज मिला और क्या मौतों को रोका जा सकता था।
हाईकोर्ट का कड़ा पहरा
दिलचस्प बात यह है कि यह समिति ऐसे समय में काम कर रही है जब इंदौर हाईकोर्ट ने पहले ही जिला प्रशासन और नगर निगम को फटकार लगाते हुए सभी संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित करने के आदेश दिए हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए नगर निगम के उन अधिकारियों को जांच प्रक्रिया से दूर रखा जाए जो खुद संदेह के घेरे में हैं।
प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव
इंदौर नगर निगम के कमिश्नर और जिला कलेक्टर पर इस समय भारी दबाव है। विपक्ष इसे नगर निगम के इतिहास की सबसे बड़ी विफलता बता रहा है। जांच समिति के गठन का उद्देश्य जनता के बीच खोए हुए विश्वास को वापस पाना भी है। समिति को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए एक महीने का समय दिया गया है, लेकिन जन दबाव को देखते हुए इसके पहले भी अंतरिम रिपोर्ट आ सकती है।
निष्कर्ष
भागीरथपुरा जल कांड केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता है। इस हाई-पावर कमेटी की रिपोर्ट यह तय करेगी कि भविष्य में इंदौर के किसी अन्य मोहल्ले को ऐसे दिन न देखने पड़ें। शहर की जनता अब केवल रिपोर्ट नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई और सुरक्षित भविष्य की गारंटी चाहती है।







